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सोमवार व्रत कथा, व्रत विधि, आरती

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सोमवार व्रत कथा
सोमवार व्रत अर्थात भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने का व्रत हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व रखता है इस दिन लोग अर्धनारीश्वर को प्रसन्न करने के लिए उन्हें विविध विविध प्रकार के व्यंजन और उनके पसंदीदा वस्तुओं का उन्हें भोग लगाते हैं जिससे भोलेनाथ और माता पार्वती प्रसन्न होकर उन्हें सुख, सम्रद्धि, भक्ति और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें. मुख्यतः अविवाहित लड़कियां 16 सोमवार का व्रत अच्छे वर प्राप्ति हेतु करती हैं और विवाहित स्त्रियाँ अच्छे वैवाहिक जीवन के लिए. पुरुष भी सुखी और शांतिपूर्ण जीवन के लिए सोमवार के व्रत को रखते हैं.

कथा इस प्रकार शुरू होती है - बहुत समय पहले एक गाँव में एक बहुत धनी साहूकार रहता था पर वो नि:संतान था इसलिए वह हमेशा दुखी रहता था परन्तु हर सोमवार को व्रत अवश्य रखता था. व्रत वाले दिन वह दिन को व्रत रखता था और रत के समय शिवलिंग के पास एक दिया जलाता था. यह देखकर एक दिन माता पार्वती ने शिवजी से कहा “हे नाथ , ये साहूकार आपका परम भक्त है, आप इसकी इच्छा पूरी क्यों नही करते”.  शिवजी ने कहा “पार्वती, यह संसार कर्म क्षेत्र है इस संसार में आदमी जैसा भी कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मिलेगा “
यह उत्तर सुनकर माता पार्वती ने पुनः शिवजी से विनती की की हे प्रभु ये साहूकार आपका परम भक्त है इसलिए कृपा करके इसकी इच्छा पूरी कीजिये. माता पार्वती के पुनः कहने पर शिवजी ने कहा की यद्यपि इस साहूकार के भाग्य में पुत्र नही है फिर भी मै आपके आग्रह पर इसको पुत्र देने का वरदान देता हु परन्तु वो केवल 12 वर्ष ही जीवित रह पायेगा.

जैसा कि भगवान् भोलेनाथ ने माता पार्वती से कहा था भगवान शिव साहूकार के स्वप्न में आये और उससे कहा की वो जल्द ही एक पुत्र का पिता बनेगा पर उसका पुत्र केवल 12 वर्षों तक ही जीवित रहेगा. जिसे सुनकर साहूकार खुश तो हुआ पर फिर यह सोचकर की उसका पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा दुखी हो गया. कुछ दिनों बाद भगवान् शिव के वरदान के अनुसार उसकी उसकी पत्नी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया. सभी घर में खुश थे पर साहूकार चाहकर भी प्रसन्न नहीं हो पा रहा था. उसने बालक की जीवन आयु के बारे में किसी को भी नहीं बता रखा था इसलिए कोई उसे सांत्वना भी नहीं दे रहा था. जब साहूकार का बालक 11 वर्ष का हुआ तो साहूकार की पत्नी ने साहूकार से उसके पुत्र के विवाह की बात करने को कहा लेकिन साहूकार ने कहा की पहले वो अपने पुत्र को शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी भेजेगा |
व्यापारी ने अपने साले और अपने पुत्र अमर के मामा दीपचंद के साथ अपने पुत्र को वाराणसी भेजा। व्यापारी ने उनसे कहा की जहा भी विश्राम करे और रुके लोगो को दान करते रहे और यज्ञ और ब्राह्मणों को भोजन कराते रहे। दोनों मामा भांजे वाराणसी के लिए निकल गए और रास्ते में जहा जहा रुकते यज्ञ और ब्राह्मणों को भोजन कराते रहते।

यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते लंबी यात्रा के बाद रात में एक नगर पहुंचे अमर जहाँ उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था। राज की कन्या के विवाह के अवसर पर पुरे नगर को बहुत अच्छे से सजाया गया था। पूर्व निर्धारित समय पर ही बारात आ गई। लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था| इस वजह से वर का पिता राजा चिन्तित था और उसे इस बात का डर लग रहा था की कही लड़की और उसके घरवालो को इस बात का पता न चल जाये की दूल्हा काना है और वो विवाह से इन्कार कर दे। इससे उसकी बदनामी होगी। वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।

वर के पिता ने इस बारे में अमर और उसके मामा से बात की। उसके मामा को लालच आ गया और वह दुल्हे के पिता के कहे अनुसार करने को तैयार हो गया।

लेकिन व्यापारी का पुत्र ईमानदार था। उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी परन्तु अपने मामा के आगे उसकी एक नहीं चली और अमर का विवाह राजकुमारी चन्द्रिका से हो गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया। जब अमर लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.' जब राजकुमारी ने अपने पल्ले पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया और अपने पिता को सब बता दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया। दूसरी ओर व्यापारी का लड़का और उसके मामा वाराणसी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया.

जब व्यापारी के पुत्र अमर की आयु 16 वर्ष की हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ के समाप्त होने पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ.। शिव के कहे अनुसार निद्रा की अवस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे। मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें.

भगवान शिव और माता पार्वती अदृश्य रूप में मृत अमर के पास गए। भगवान शिव ने अमर को देखा तो बोले की यह तो उसकी व्यापारी का पुत्र है जिसे तुम्हारे कहने पर मैंने 16 वर्ष की अल्पायु वाले पुत्र का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित कर दीजिये। नहीं तो इसके माता-पिता अपने पुत्र की मृत्यु के शोक में अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।' माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया.

वाराणसी ने जब अमर की शिक्षा समाप्त हो गयी तो वह मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। चलते चलते दोनों उसी नगर में भी पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा। उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।

इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे। अमर के नगर में पहुंचते ही एक दूत ने व्यापारी को उसके पुत्र के आगमन की सूचना दी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ। व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने पुत्र अमर के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने भगवान शिव को मन ही मन बहुत बहुत धन्यवाद किया। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है। इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।'

सोमवार व्रत की विधि

नारद पुराण के अनुसार सोमवार व्रत दिन के तीसरे प्रहर यानी शाम तक रखा जाता है। सोमवार व्रत रखने वाले को प्रातः स्नान करके शिव जी को गंगाजल, बेलपत्र, सुपारी, पुष्प, धतूरा, भांग आदि चढ़ाना चाहिए तथा शिव-पार्वती की पूजा करनी चाहिए. तत्पश्चात सोमवार व्रत की कथा सुननी चाहिए. साथ ही शिव मंत्रो का भी जाप करना चाहिए. तीसरा प्रहर खत्म होने के बाद एक ही बार सात्विक भोजन करना चाहिए और रात्रि के समय जमीन पर सोना चाहिए

ध्यान रखने योग्य


  • सोमवार व्रत रखने वाले को अनैतिक कार्य करने से बचना चाहिए और मन में बुरे या गलत विचारों को नहीं आने देना चाहिए.
  • व्रत वाले दिन ब्रहमचर्य का पालन करना चाहिए.
  • असहायों और निर्बलों की यथासंभव सहायता करना चाहिए.
  • मांस-मदिरा से दूर रहना चाहिए.


सोमवार व्रत आरती

जय शिव ओंकारा जय शिव ओंकारा |
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव अर्दाडी धारा | टेक
एकानन, चतुरानन, पंचानन राजे |
हंसानन गरुडासन बर्षवाहन साजै | जय...
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अते सोहै |
तीनो रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहै | जय...
अक्षयमाला वन माला मुंड माला धारी |
त्रिपुरारी कंसारी वर माला धारो |जय...
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे |
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे । जय...
कर मे श्रेष्ठ कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता
जग - कर्ता जग - हर्ता जग पालन कर्ता। जय...
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव जानत अविवेका
प्रणवाक्षर के मध्य ये तीनो एका | जय
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई गावे |
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे | जय...

1 comment:

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