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वैभव लक्ष्मी व्रत कथा | Vaibhav Laxmi Vrat Katha, Puja Vidhi, Mantra in Hindi

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Vaibhav Laxmi Vrat Katha Puja Vidhi Mantra
सुख, शांति, वैभव और लक्ष्मी प्राप्ति के लिए अद्भुत चमत्कारी प्राचीन व्रत
वैभव लक्ष्मी व्रत हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रखता है क्यूंकि ऐसा माना जाता है की जो कोई भी वैभव लक्ष्मी का व्रत रखता है उसके सारे काम शुभ होते हैं और असफलता उसके पास नहीं भटकती| नीचे वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा कही गयी है जिसको  भी व्रत में पढना जरुरी माना जाता है| अगर आप भी वैभव लक्ष्मी माता का व्रत रखते हैं तो नीचे वैभव लक्ष्मी माता का व्रत करने का तरीका और इसे करने की विधि नीचे दी गयी है| यद्यपि हमने यहाँ पर शब्दों की त्रुटियों का ध्यान रखा है पर फिर भी आपको नीचे लिखी वैभव लक्ष्मी माता व्रत की विधि या वैभव लक्ष्मी माता व्रत कथा में कोई गलती मिले तो हमें नीचे कमेंट में लिख कर जरुर बताये

वैभव लक्ष्मी व्रत करने का नियम | Vaibhav Laxmi Puja Vidhi in Hindi

  • यह व्रत सौभाग्यशाली स्त्रियां करें तो उनका अति उत्तम फल मिलता है, पर घर में यदि सौभाग्यशाली स्त्रियां न हों तो कोई भी स्त्री एवं कुमारिका भी यह व्रत कर सकती है।
  • स्त्री के बदले पुरुष भी यह व्रत करें तो उसे भी उत्तम फल अवश्य मिलता है।
  • यह व्रत पूरी श्रद्धा और पवित्र भाव से करना चाहिए। खिन्न होकर या बिना भाव से यह व्रत नहीं करना चाहिए। 
  • यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है। व्रत शुरु करते वक्त 11 या 21 शुक्रवार की मन्नत रखनी पड़ती है और बताई गई शास्त्रीय विधि अनुसार ही व्रत करना चाहिए। मन्नत के शुक्रवार पूरे होने पर विधिपूर्वक और बताई गई शास्त्रीय रीति के अनुसार उद्यापन करना चाहिए। यह विधि सरल है। किन्तु शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत न करने पर व्रत का जरा भी फल नहीं मिलता है। 
  • एक बार व्रत पूरा करने के पश्चात फिर मन्नत कर सकते हैं और फिर से व्रत कर सकते हैं।
  • माता लक्ष्मी देवी के अनेक स्वरूप हैं। उनमें उनका ‘धनलक्ष्मी’ स्वरूप ही ‘वैभवलक्ष्मी’ है और माता लक्ष्मी को श्रीयंत्र अति प्रिय है। व्रत करते समय माता लक्ष्मी के विविध स्वरूप यथा श्रीगजलक्ष्मी, श्री अधिलक्ष्मी, श्री विजयलक्ष्मी, श्री ऐश्वर्यलक्ष्मी, श्री वीरलक्ष्मी, श्री धान्यलक्ष्मी एवं श्री संतानलक्ष्मी तथा श्रीयंत्र को प्रणाम करना चाहिए।
  • व्रत के दिन सुबह से ही ‘जय माँ लक्ष्मी’, ‘जय माँ लक्ष्मी’ का रटन मन ही मन करना चाहिए और माँ का पूरे भाव से स्मरण करना चाहिए।
  • शुक्रवार के दिन यदि आप प्रवास या यात्रा पर गये हों तो वह शुक्रवार छोड़कर उनके बाद के शुक्रवार को व्रत करना चाहिए अर्थात् व्रत अपने ही घर में करना चाहिए। कुल मिलाकर जितने शुक्रवार की मन्नत ली हो, उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिए।
  • घर में सोना न हो तो चाँदी की चीज पूजा में रखनी चाहिए। अगर वह भी न हो तो रोकड़ रुपया रखना चाहिए।
  • व्रत पूरा होने पर कम से कम सात स्त्रियों को या आपकी इच्छा अनुसार जैसे 11, 21, 51 या 101 स्त्रियों को वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक कुमकुम का तिलक करके भेंट के रूप में देनी चाहिए। जितनी ज्यादा पुस्तक आप देंगे उतनी माँ लक्ष्मी की ज्यादा कृपा होगी और माँ लक्ष्मी जी के इस अद्भुत व्रत का ज्यादा प्रचार होगा।
  • व्रत के शुक्रवार को स्त्री रजस्वला हो या सूतकी हो तो वह शुक्रवार छोड़ देना चाहिए और बाद के शुक्रवार से व्रत शुरु करना चाहिए। पर जितने शुक्रवार की मन्नत मानी हो, उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिए।
  • व्रत की विधि शुरु करते वक्त ‘लक्ष्मी स्तवन’ का एक बार पाठ करना चाहिए। लक्ष्मी स्तवन इस प्रकार है- 

वैभव लक्ष्मी मंत्र | Vaibhav Laxmi Mantra


                         या रक्ताम्बुजवासिनी विलसिनी चण्डांशु तेजस्विनीं।
                         या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी।।
                         या   रत्नाकरमन्थनात्प्रगटितां विष्णोस्वया गेहिनी।
                         सा   मां   पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती।।
अर्थात् - जो लाल कमल में रहती है, जो अपूर्व कांतिवाली हैं, जो असह्य तेजवाली हैं, जो पूर्णरूप से लाल हैं, जिसने रक्तरूप वस्त्र पहने हैं, जे भगवान विष्णु को अतिप्रिय हैं, जो लक्ष्मी मन को आनन्द देती हैं, जो समुद्रमंथन से प्रकट हुई है, जो विष्णु भगवान की पत्नी हैं, जो कमल से जन्मी हैं और जो अतिशय पूज्य है, वैसी हे लक्ष्मी देवी! आप मेरी रक्षा करें।

  • व्रत के दिन हो सके तो उपवास करना चाहिए और शाम को व्रत की विधि करके माँ का प्रसाद लेकर व्रत करना चाहिए। अगर न हो सके तो फलाहार या एक बार भोजन कर के शुक्रवार का व्रत रखना चाहिए। अगर व्रतधारी का शरीर बहुत कमजोर हो तो ही दो बार भोजन ले सकते हैं। सबसे महत्व की बात यही है कि व्रतधारी माँ लक्ष्मी जी पर पूरी-पूरी श्रद्धा और भावना रखे और ‘मेरी मनोकामना माँ पूरी करेंगी ही’, ऐसा दृढ़ विश्वास रखकर व्रत करे।


वैभवलक्ष्मी व्रत की कथा | Vaibhav Lakshmi Vrat Katha

एक बड़ा शहर था। इस शहर में लाखों लोग रहते थे। पहले के जमाने के लोग साथ-साथ रहते थे और एक दूसरे के काम आते थे। पर नये जमाने के लोगों का स्वरूप ही अलग सा है। सब अपने अपने काम में रत रहते हैं। किसी को किसी की परवाह नहीं। घर के सदस्यों को भी एक-दूसरे की परवाह नहीं होती। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गये हैं। शहर में बुराइयाँ बढ़ गई थी। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती आदि बहुत से अपराध शहर में होते थे।

कहावत है कि ‘हजारों निराशा में एक अमर आशा छिपी हुई है’ इसी तरह इतनी सारी बुराइयों के बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे। ऐसे अच्छे लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उनका पति ईमानदारी से जीते थे। वे किसी की बुराई न करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। उनकी गृहस्थी आदर्श गृहस्थी थी और शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।

शीला की गृहस्थी इसी तरह खुशी-खुशी चल रही थी। पर कहा जाता है कि ‘कर्म की गति अकल है’, विधाता के लिखे लेख कोई नहीं समझ सकता है। इन्सान का नसीब पल भर में राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। शीला के पति के अगले जन्म के कर्म भोगने बाकी रह गये होंगे कि वह बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। वह जल्द से जल्द करोड़पति होने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल निकला और करोड़पति के बजाय रोड़पति बन गया। याने रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी स्थिति हो गयी थी।

शहर में शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा आदि बदियां फैली हुई थीं। उसमें शीला का पति भी फँस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। जल्द से जल्द पैसे वाला बनने की लालच में दोस्तों के साथ रेस जुआ भी खेलने लगा। इस तरह बचाई हुई धनराशि, पत्नी के गहने, सब कुछ रेस-जुए में गँवा दिया था। समय के परिवर्तन के साथ घर में दरिद्रता और भुखमरी फैल गई। सुख से खाने के बजाय दो वक्त के भोजन के लाले पड़ गये और शीला को पति की गालियाँ खाने का वक्त आ गया था। शीला सुशील और संस्कारी स्त्री थी। उसको पति के बर्ताव से बहुत दुख हुआ। किन्तु वह भगवान पर भरोसा करके बड़ा दिल रख कर दुख सहने लगी। कहा जाता है कि ‘सुख के पीछे दुख और दुख के पीछे सुख आता ही है। इसलिए दुख के बाद सुख आयेगा ही, ऐसी श्रद्धा के साथ शीला प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी। इस तरह शीला असह्य दुख सहते-सहते प्रभुभक्ति में वक्त बिताने लगी।
अचानक एक दिन दोपहर में उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला सोच में पड़ गयी कि मुझ जैसे गरीब के घर इस वक्त कौन आया होगा? फिर भी द्वार पर आये हुए अतिथि का आदर करना चाहिए, ऐसे आर्य धर्म के संस्कार वाली शीला ने खड़े होकर द्वार खोला। देखा तो एक माँ जी खड़ी थी। वे बड़ी उम्र की लगती थीं। किन्तु उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था। उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलकता था। उनको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। वैसे शीला इस माँ जी को पहचानती न थी, फिर भी उनको देखकर शीला के रोम-रोम में आनन्द छा गया। शीला माँ जी को आदर के साथ घर में ले आयी। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचा कर एक फटी हुई चादर पर उनको बिठाया।
माँ जी ने कहा: ‘क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं?’
शीला ने सकुचा कर कहा: ‘माँ! आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है। बहुत शांति हो रही है। ऐसा लगता है कि मैं बहुत दिनों से जिसे ढूढ़ रही थी वे आप ही हैं, पर मैं आपको पहचान नहीं सकती।’
माँ जी ने हँसकर कहा: ‘क्यों? भूल गई? हर शुक्रवार को लक्ष्मी जी के मंदिर में भजन-कीर्तन होते हैं, तब मैं भी वहाँ आती हूँ। वहाँ हर शुक्रवार को हम मिलते हैं।’
पति गलत रास्ते पर चढ़ गया, तब से शीला बहुत दुखी हो गई थी और दुख की मारी वह लक्ष्मीजी के मंदिर में भी नहीं जाती थी। बाहर के लोगों के साथ नजर मिलाते भी उसे शर्म लगती थी। उसने याददाश्त पर जोर दिया पर वह माँ जी याद नहीं आ रही थीं।
तभी माँ जी ने कहा: ‘तू लक्ष्मी जी के मंदिर में कितने मधुर भजन गाती थी। अभी-अभी तू दिखाई नहीं देती थी, इसलिए मुझे हुआ कि तू क्यों नहीं आती है? कहीं बीमार तो नहीं हो गई है न? ऐसा सोचकर मैं तुझसे मिलने चली आई हूँ।’
माँ जी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आँखों में आँसू आ गये। माँ जी के सामने वह बिलख-बिलख कर रोने लगी। यह देख कर माँ जी शीला के नजदीक आयीं और उसकी सिसकती पीठ पर प्यार भरा हाथ फेर कर सांत्वना देने लगीं।
माँ जी ने कहा: ‘बेटी! सुख और दुख तो धूप छांव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! और तुझे परेशानी क्या है? तेरे दुख की बात मुझे सुना। तेरा मन हलका हो जायेगा और तेरे दुख का कोई उपाय भी मिल जायेगा।’
माँ जी की बात सुनकर शीला के मन को शांति मिली।
उसने माँ जी से कहा: ‘माँ! मेरी गृहस्थी में भरपूर सुख और खुशियाँ थीं, मेरे पति भी सुशील थे। अचानक हमारा भाग्य हमसे रूठ गया। मेरे पति बुरी संगति में फँस गये और बुरी आदतों के शिकार हो गये तथा अपना सब-कुछ गवाँ बैठे हैं तथा हम रास्ते के भिखारी जैसे बन गये हैं।’

यह सुन कर माँ जी ने कहा: ‘ऐसा कहा जाता है कि , ‘कर्म की गति न्यारी होती है’, हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आयेंगे। तू तो माँ लक्ष्मी जी की भक्त है। माँ लक्ष्मी जी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रख कर माँ लक्ष्मी जी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा।
‘माँ लक्ष्मी जी का व्रत’ करने की बात सुनकर शीला के चेहरे पर चमक आ गई। उसने पूछा: ‘माँ! लक्ष्मी जी का व्रत कैसे किया जाता है, वह मुझे समझाइये। मैं यह व्रत अवश्य करूँगी।’

माँ जी ने कहा: ‘बेटी! माँ लक्ष्मी जी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-सम्पत्ति और यश प्राप्त करता है। ऐसा कहकर माँ जी ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की विधि कहने लगी।

‘बेटी! वैभवलक्ष्मी व्रत वैसे तो सीधा-सादा व्रत है। किन्तु कई लोग यह व्रत गलत तरीके से करते हैं, अतः उसका फल नहीं मिलता। कई लोग कहते हैं कि सोने के गहने की हलदी-कुमकुम से पूजा करो बस व्रत हो गया। पर ऐसा नहीं है। कोई भी व्रत शास्त्रीय विधि से करना चाहिए। तभी उसका फल मिलता है। सच्ची बात यह है कि सोने के गहनों का विधि से पूजन करना चाहिए। व्रत की उद्यापन विधि भी शास्त्रीय विधि से करना चाहिए।
यह व्रत शुक्रवार को करना चाहिए। प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनो और सारा दिन ‘जय माँ लक्ष्मी’  का रटन करते रहो। किसी की चुगली नहीं करनी चाहिए। शाम को पूर्व दिशा में मुँह करके आसन पर बैठ जाओ। सामने पाटा रखकर उस पर रुमाल रखो। रुमाल पर चावल का छोटा सा ढेर करो। उस ढेर पर पानी से भरा तांबे का कलश रख कर, कलश पर एक कटोरी रखो। उस कटोरी में एक सोने का गहना रखो। सोने का न हो तो चांदी का भी चलेगा। चांदी का न  हो तो नकद रुपया भी चलेगा। बाद में घी का दीपक जला कर अगरबत्ती सुलगा कर रखो।

माँ लक्ष्मी जी के बहुत स्वरूप हैं। और माँ लक्ष्मी जी को ‘श्रीयंत्र’ अति प्रिय है। अतः ‘वैभवलक्ष्मी’ में पूजन विधि करते वक्त सर्वप्रथम ‘श्रीयंत्र’ और लक्ष्मी जी के विविध स्वरूपों का सच्चे दिल से दर्शन करो। उसके बाद ‘लक्ष्मी स्तवन’ का पाठ करो। बाद में कटोरी में रखे हुए गहने या रुपये को हल्दी-कुमकुम और चावल चढ़ाकर पूजा करो और लाल रंग का फूल चढ़ाओ। शाम को कोई मीठी चीज बना कर उसका प्रसाद रखो। न हो सके तो शक्कर या गुड़ भी चल सकता है। फिर आरती करके ग्यारह बार सच्चे हृदय से ‘जय माँ लक्ष्मी’ बोलो। बाद में ग्यारह या इक्कीस शुक्रवार यह व्रत करने का दृढ़ संकल्प माँ के सामने करो और आपकी जो मनोकामना हो वह पूरी करने को माँ लक्ष्मी जी से विनती करो। फिर माँ का प्रसाद बाँट दो। और थोड़ा प्रसाद अपने लिए रख लो। अगर आप में शक्ति हो तो सारा दिन उपवास रखो और सिर्फ प्रसाद खा कर शुक्रवार का व्रत करो। न शक्ति हो तो एक बार शाम को प्रसाद ग्रहण करते समय खाना खा लो। अगर थोड़ी शक्ति भी न हो तो दो बार भोजन कर सकते हैं। बाद में कटोरी में रखा गहना या रुपया ले लो। कलश का पानी तुलसी की क्यारी में डाल दो और चावल पक्षियों को डाल दो। इसी तरह शास्त्रीय विधि से व्रत करने से उसका फल अवश्य मिलता है। इस व्रत के प्रभाव से सब प्रकार की विपत्ति दूर हो कर आदमी मालामाल हो जाता हैं संतान न हो तो संतान प्राप्ति होती है। सौभाग्वती स्त्री का सौभाग्य अखण्ड रहता है। कुमारी लड़की को मनभावन पति मिलता है।

शीला यह सुनकर आनन्दित हो गई। फिर पूछा: ‘माँ! आपने वैभवलक्ष्मी व्रत की जो शास्त्रीय विधि बताई है, वैसे मैं अवश्य करूंगी। किन्तु उसकी उद्यापन विधि किस तरह करनी चाहिए? यह भी कृपा करके सुनाइये।’

माँ जी ने कहा: ‘ग्यारह या इक्कीस जो मन्नत मानी हो उतने शुक्रवार यह वैभवलक्ष्मी व्रत पूरी श्रद्धा और भावना से करना चाहिए। व्रत के आखिरी शुक्रवार को खीर का नैवेद्य रखो। पूजन विधि हर शुक्रवार को करते हैं वैसे ही करनी चाहिए। पूजन विधि के बाद श्रीफल फोड़ो और कम से कम सात कुंवारी या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक करके ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की एक-एक पुस्तक उपहार में देनी चाहिए और सब को खीर का प्रसाद देना चाहिए। फिर धनलक्ष्मी स्वरूप, वैभवलक्ष्मी स्वरूप, माँ लक्ष्मी जी की छवि को प्रणाम करें। माँ लक्ष्मी जी का यह स्वरूप वैभव देने वाला है। प्रणाम करके मन ही मन भावुकता से माँ की प्रार्थना करते वक्त कहें कि , ‘हे माँ धनलक्ष्मी! हे माँ वैभवलक्ष्मी! मैंने सच्चे हृदय से आपका व्रत पूर्ण किया है। तो हे माँ! हमारी मनोकामना पूर्ण कीजिए। हमारा सबका कल्याण कीजिए। जिसे संतान न हो उसे संतान देना। सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखण्ड रखना। कुंवारी लड़की को मनभावन पति देना। आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत जो करे उसकी सब विपत्ति दूर करना। सब को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपरम्पार है।’

माँ जी के पास से वैभवलक्ष्मी व्रत की शास्त्रीय विधि सुनकर शीला भावविभोर हो उठी। उसे लगा मानो सुख का रास्ता मिल गया। उसने आँखें बंद करके मन ही मन उसी क्षण संकल्प लिया कि, ‘हे वैभवलक्ष्मी माँ! मैं भी माँ जी के कहे अनुसार श्रद्धापूर्वक शास्त्रीय विधि से वैभवलक्ष्मी व्रत इक्कीस शुक्रवार तक करूँगी और व्रत की शास्त्रीय रीति के अनुसार उद्यापन भी करूँगी।

शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि माँ जी कहां गयी? यह माँ जी कोई दूसरा नहीं साक्षात लक्ष्मी जी ही थीं। शीला लक्ष्मी जी की भक्त थी इसलिए अपने भक्त को रास्ता दिखाने के लिए माँ लक्ष्मी देवी माँ जी का स्वरूप धारण करके शीला के पास आई थीं।

दूसरे दिन शुक्रवार था। प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहन कर शीला मन ही मन श्रद्धा और पूरे भाव से ‘जय माँ लक्ष्मी’ का मन ही मन रटन करने लगी। सारा दिन किसी की चुगली नहीं की। शाम हुई तब हाथ-पांव-मुंह धो कर शीला पूर्व दिशा में मुंह करके बैठी। घर में पहले तो सोने के बहुत से गहने थे पर पति ने गलत रास्ते पर चलकर सब गिरवी रख दिये। पर नाक की कील (पुल्ली) बच गई थी। नाक की कील निकाल कर, उसे धोकर शीला ने कटोरी में रख दी। सामने पाटे पर रुमाल रख कर मुठ्ठी भर चावल का ढेर किया। उस पर तांबे का कलश पानी भरकर रखा। उसके ऊपर कील वाली कटोरी रखी। फिर विधिपूर्वक वंदन, स्तवन, पूजन वगैरह किया और घर में थोड़ी शक्कर थी, वह प्रसाद में रख कर वैभवलक्ष्मी व्रत किया।

यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनन्द हुआ। उसके मन में वैभवलक्ष्मी व्रत के लिए श्रद्ध बढ़ गई।
शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक व्रत किया। इक्कीसवें शुक्रवार को विधिपूर्वक उद्यापन विधि करके सात स्त्रियों को वैभवलक्ष्मी व्रत की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माता जी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगी: ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मन्नत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखण्ड रखना। कुंवारी लड़की को मनभावन पति देना। जो कोई आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उसकी सब विपत्ति दूर करना। सब को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के धनलक्ष्मी स्वरूप की छवि को प्रणाम किया।

इस तरह शास्त्रीय विधि से शीला ने श्रद्धा से व्रत किया और तुरन्त ही उसे फल मिला। उसका पति सही रास्ते पर चलने लगा और अच्छा आदमी बन गया तथा कड़ी मेहनत से व्यवसाय करने लगा। धीरे धीरे समय परिवर्तित हुआ और उसने शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई।

वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी शास्त्रीय विधि से वैभवलक्ष्मी का व्रत करने लगीं। हे माँ धनलक्ष्मी! आप जैसे शीला पर प्रसन्न हुईं, उसी तरह आपका व्रत करने वाले सब पर प्रसन्न होना। सबको सुख-शांति देना। जय धनलक्ष्मी माँ! जय वैभवलक्ष्मी माँ!

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Sukh, Shaanti, Vaibhav aur Lakshmi Praapti ke liye Adbhut Chamatkaari Praacheen Vrat

Vaibhav Lakshmi Vrat Karne ka Niyam

  • Yah vrat saubhaagyashaalee striyaan karen to unaka ati uttam phal milata hai, par ghar mein yadi saubhaagyashaalee striyaan na hon to koee bhee stree evan kumaarika bhee yah vrat kar sakatee hai.
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  • Yah Vrat pooree shraddha aur pavitr bhaav se karana chaahie. khinn hokar ya bina bhaav se yah vrat nahin karana chaahie. 
  • Yah Vrat shukravaar ko kiya jaata hai. vrat shuru karate vakt 11 ya 21 shukravaar kee mannat rakhanee padatee hai aur bataee gaee shaastreey vidhi anusaar hee vrat karana chaahie. mannat ke Shukravaar Poore hone par Vidhipoorvak aur Batai Gai Shaastreey Reeti ke Anusaar udyaapan karana chaahie. yah vidhi saral hai. kintu shaastreey vidhi anusaar vrat na karane par Vrat ka jara bhee phal nahin milata hai. 
  • Ek baar vrat poora karane ke pashchaat phir mannat kar sakate hain aur phir se vrat kar sakate hain.
  • Maata lakshmee devee ke anek svaroop hain. unamen unaka ‘dhanalakshmee’ svaroop hee ‘Vaibhav Lakxmi’ hai aur maata lakshmee ko shreeyantr ati priy hai. Vrat karte samay Maata Lakshmi ke vividh svaroop yatha shreegajalakshmee, shree adhilakshmee, shree vijayalakshmee, shree aishvaryalakshmee, shree veeralakshmee, shree dhaanyalakshmee evan shree santaanalakshmee tatha shreeyantr ko pranaam karana chaahie.
  • Vrat ke din subah se hee ‘Jay Maa Lakshmi’, ‘Jay maa Lakxmi’ ka ratan man hee man karana chaahie aur maan ka poore bhaav se smaran karana chaahie.
  • Shukravaar ke din yadi aap pravaas ya yaatra par gaye hon to vah shukravaar chhodakar unake baad ke shukravaar ko vrat karana chaahie arthaat vrat apane hee ghar mein karana chaahie. kul milaakar jitane shukravaar kee mannat lee ho, utane shukravaar poore karane chaahie.
  • Ghar mein sona na ho to chaandee kee cheej pooja mein rakhanee chaahie. agar vah bhee na ho to rokad rupaya rakhana chaahie.
  • Vrat poora hone par kam se kam saat striyon ko ya aapakee ichchha anusaar jaise 11, 21, 51 ya 101 striyon ko Vaibhav Lakshmee Vrat kee Pustak Kumakum ka Tilak Karake bhent ke roop mein denee chaahie. jitanee jyaada pustak aap denge utanee maan lakshmee kee jyaada krpa hogee aur maan lakshmee jee ke is adbhut vrat ka jyaada prachaar hoga.
  • Vrat ke Shukravaar ko stree rajasvala ho ya sootakee ho to vah shukravaar chhod dena chaahie aur baad ke shukravaar se vrat shuru karana chaahie. par jitane shukravaar kee mannat maanee ho, utane shukravaar poore karane chaahie.
  • vrat kee vidhi shuru karate vakt ‘lakshmee stavan’ ka ek baar paath karana chaahie. lakshmee stavan is prakaar hai- 
             Ya Raktaambujavaasinee Vilasinee Chandaanshu Tejasvineen
             Ya Rakta Rudhiraambara Harisakhee Ya Shree Manolhaadinee
             Ya Ratnaakaramanthanaatpragatitaan Vishnosvaya Gehinee.
             Sa Maa Paatu Manorama Bhagavatee Lakshmishch Padmaavatee
arthaat - jo laal kamal mein rahatee hai, jo apoorv kaantivaalee hain, jo asahy tejavaalee hain, jo poornaroop se laal hain, jisane raktaroop vastr pahane hain, je bhagavaan vishnu ko atipriy hain, jo lakshmee man ko aanand detee hain, jo samudramanthan se prakat huee hai, jo vishnu bhagavaan kee patnee hain, jo kamal se janmee hain aur jo atishay poojy hai, vaisee he lakshmee devee! aap meree raksha karen.
  • Vrat Ke Din Ho Sake To Upavaas Karana Chaahie Aur Shaam Ko Vrat Kee Vidhi Karake Maan Ka Prasaad Lekar Vrat Karana Chaahie. Agar Na Ho Sake To Phalaahaar Ya Ek Baar Bhojan Kar Ke Shukravaar Ka Vrat Rakhana Chaahie. Agar Vratadhaaree Ka Shareer Bahut Kamajor Ho To Hee Do Baar Bhojan Le Sakate Hain. Sabase Mahatv Kee Baat Yahee Hai Ki Vratadhaaree Maan Lakshmee Jee Par Pooree-Pooree Shraddha Aur Bhaavana Rakhe Aur ‘Meri Manokaamana Maa Pooree Karengee Hee’, Aisa Drdh Vishvaas Rakhakar Vrat Kare.

Vaibhav Lakxmi Vrat Katha

Ek Bada Shahar Tha. Is Shahar Mein Laakhon Log Rahate The. Pahale Ke Jamaane Ke Log Saath-Saath Rahte The Aur Ek Doosre Ke Kaam Aate The. Par Naye Jamaane Ke Logon Ka Svaroop Hee Alag Sa Hai. Sab Apane Apane Kaam Mein Rat Rahate Hain. Kisi Ko Kisi Kee Paravaah Nahin. Ghar Ke Sadasyon Ko Bhee Ek-Doosare Kee Paravaah Nahin Hotee. Bhajan-Keertan, Bhakti-Bhaav, Daya-Maaya, Paropakaar Jaise Sanskaar Kam Ho Gaye Hain. Shahar Mein Buraiyaan Badh Gaee Thee. Sharaab, Jua, Res, Vyabhichaar, Choree-Dakaitee Aadi Bahut Se Aparaadh Shahar Mein Hote The.

Kahaavat Hai Ki ‘Hajaaron Niraasha Mein Ek Amar Aasha Chhipee Hui Hai’ Isi Tarah Itani Saari Buraiyon Ke Baavajood Shahar Mein Kuchh Achchhe Log Bhee Rahate The. Aise Achchhe Logon Mein Sheela Aur Unake Pati Kee Grhasthee Maanee Jaatee Thee. Sheela Dhaarmik Prakrti Kee Aur Santoshee Thee. Unaka Pati Bhee Vivekee Aur Susheel Tha. Sheela Aur Unaka Pati Eemaanadaaree Se Jeete The. Ve Kisee Kee Buraee Na Karate The Aur Prabhu Bhajan Mein Achchhee Tarah Samay Vyateet Kar Rahe The. Unakee Grhasthee Aadarsh Grhasthee Thee Aur Shahar Ke Log Unakee Grhasthee Kee Saraahana Karate The.
Sheela Kee Grhasthee Isee Tarah Khushee-Khushee Chal Rahee Thee. Par Kaha Jaata Hai Ki ‘Karm Kee Gati Akal Hai’, Vidhaata Ke Likhe Lekh Koi Nahin Samajh Sakata Hai. Insaan Ka Naseeb Pal Bhar Mein Raaja Ko Rank Bana Deta Hai Aur Rank Ko Raaja. Sheela Ke Pati Ke Agale Janm Ke Karm Bhogane Baakee Rah Gaye Honge Ki Vah Bure Logon Se Dostee Kar Baitha. Vah Jald Se Jald Karodapati Hone Ke Khvaab Dekhane Laga. Isalie Vah Galat Raaste Par Chal Nikala Aur Karodapati Ke Bajaay Rodapati Ban Gaya. Yaane Raaste Par Bhatakate Bhikhaaree Jaisee Usakee Sthiti Ho Gayee Thee.

Shahar Mein Sharaab, Jua, Res, Charas-Gaanja Aadi Badiyaan Phailee Huee Theen. Usamen Sheela Ka Pati Bhee Phans Gaya. Doston Ke Saath Use Bhee Sharaab Kee Aadat Ho Gaee. Jald Se Jald Paise Vaala Banane Kee Laalach Mein Doston Ke Saath Res Jua Bhee Khelane Laga. Is Tarah Bachaee Huee Dhanaraashi, Patnee Ke Gahane, Sab Kuchh Res-Jue Mein Ganva Diya Tha. Samay Ke Parivartan Ke Saath Ghar Mein Daridrata Aur Bhukhamaree Phail Gaee. Sukh Se Khaane Ke Bajaay Do Vakt Ke Bhojan Ke Laale Pad Gaye Aur Sheela Ko Pati Kee Gaaliyaan Khaane Ka Vakt Aa Gaya Tha. Sheela Susheel Aur Sanskaaree Stree Thee. Usako Pati Ke Bartaav Se Bahut Dukh Hua. Kintu Vah Bhagavaan Par Bharosa Karake Bada Dil Rakh Kar Dukh Sahane Lagee. Kaha Jaata Hai Ki ‘Sukh Ke Peechhe Dukh Aur Dukh Ke Peechhe Sukh Aata Hee Hai. Isalie Dukh Ke Baad Sukh Aayega Hee, Aisee Shraddha Ke Saath Sheela Prabhu Bhakti Mein Leen Rahane Lagee. Is Tarah Sheela Asahy Dukh Sahate-Sahate Prabhubhakti Mein Vakt Bitaane Lagee.

Achaanak Ek Din Dopahar Mein Unke Dvaar Par Kisee Ne Dastak Dee. Sheela Soch Mein Pad Gayee Ki Mujh Jaise Gareeb Ke Ghar Is Vakt Kaun Aaya Hoga? Phir Bhee Dvaar Par Aaye Hue Atithi Ka Aadar Karana Chaahie, Aise Aary Dharm Ke Sanskaar Vaalee Sheela Ne Khade Hokar Dvaar Khola. Dekha To Ek Maan Jee Khadee Thee. Ve Badee Umr Kee Lagatee Theen. Kintu Unake Chehare Par Alaukik Tej Nikhar Raha Tha. Unakee Aankhon Mein Se Maano Amrt Bah Raha Tha. Unaka Bhavy Chehara Karuna Aur Pyaar Se Chhalakata Tha. Unako Dekhate Hee Sheela Ke Man Mein Apaar Shaanti Chha Gaee. Vaise Sheela Is Maan Jee Ko Pahachaanatee Na Thee, Phir Bhee Unako Dekhakar Sheela Ke Rom-Rom Mein Aanand Chha Gaya. Sheela Maan Jee Ko Aadar Ke Saath Ghar Mein Le Aayee. Ghar Mein Bithaane Ke Lie Kuchh Bhee Nahin Tha. Atah Sheela Ne Sakucha Kar Ek Phatee Huee Chaadar Par Unako Bithaaya.

Maan Jee Ne Kaha: ‘Kyon Sheela! Mujhe Pahachaana Nahin?’
Sheela Ne Sakucha Kar Kaha: ‘Maan! Aapako Dekhate Hee Bahut Khushee Ho Rahee Hai. Bahut Shaanti Ho Rahee Hai. Aisa Lagata Hai Ki Main Bahut Dinon Se Jise Dhoodh Rahee Thee Ve Aap Hee Hain, Par Main Aapako Pahachaan Nahin Sakatee.’
Maan Jee Ne Hansakar Kaha: ‘Kyon? Bhool Gaee? Har Shukravaar Ko Lakshmee Jee Ke Mandir Mein Bhajan-Keertan Hote Hain, Tab Main Bhee Vahaan Aatee Hoon. Vahaan Har Shukravaar Ko Ham Milate Hain.’
Pati Galat Raaste Par Chadh Gaya, Tab Se Sheela Bahut Dukhee Ho Gaee Thee Aur Dukh Kee Maaree Vah Lakshmeejee Ke Mandir Mein Bhee Nahin Jaatee Thee. Baahar Ke Logon Ke Saath Najar Milaate Bhee Use Sharm Lagatee Thee. Usane Yaadadaasht Par Jor Diya Par Vah Maan Jee Yaad Nahin Aa Rahee Theen.
Tabhee Maan Jee Ne Kaha: ‘Too Lakshmee Jee Ke Mandir Mein Kitane Madhur Bhajan Gaatee Thee. Abhee-Abhee Too Dikhaee Nahin Detee Thee, Isalie Mujhe Hua Ki Too Kyon Nahin Aatee Hai? Kaheen Beemaar To Nahin Ho Gaee Hai Na? Aisa Sochakar Main Tujhase Milane Chalee Aaee Hoon.’
Maan Jee Ke Ati Prem Bhare Shabdon Se Sheela Ka Hrday Pighal Gaya. Usakee Aankhon Mein Aansoo Aa Gaye. Maan Jee Ke Saamane Vah Bilakh-Bilakh Kar Rone Lagee. Yah Dekh Kar Maan Jee Sheela Ke Najadeek Aayeen Aur Usakee Sisakatee Peeth Par Pyaar Bhara Haath Pher Kar Saantvana Dene Lageen.
Maan Jee Ne Kaha: ‘Betee! Sukh Aur Dukh To Dhoop Chhaanv Jaise Hote Hain. Dhairy Rakho Betee! Aur Tujhe Pareshaanee Kya Hai? Tere Dukh Kee Baat Mujhe Suna. Tera Man Halaka Ho Jaayega Aur Tere Dukh Ka Koee Upaay Bhee Mil Jaayega.’
Maan Jee Kee Baat Sunakar Sheela Ke Man Ko Shaanti Milee.
Usane Maan Jee Se Kaha: ‘Maan! Meree Grhasthee Mein Bharapoor Sukh Aur Khushiyaan Theen, Mere Pati Bhee Susheel The. Achaanak Hamaara Bhaagy Hamase Rooth Gaya. Mere Pati Buree Sangati Mein Phans Gaye Aur Buree Aadaton Ke Shikaar Ho Gaye Tatha Apana Sab-Kuchh Gavaan Baithe Hain Tatha Ham Raaste Ke Bhikhaaree Jaise Ban Gaye Hain.’

Yah Sun Kar Maan Jee Ne Kaha: ‘Aisa Kaha Jaata Hai Ki , ‘Karm Kee Gati Nyaaree Hotee Hai’, Har Insaan Ko Apane Karm Bhugatane Hee Padate Hain. Isalie Too Chinta Mat Kar. Ab Too Karm Bhugat Chukee Hai. Ab Tumhaare Sukh Ke Din Avashy Aayenge. Too To Maan Lakshmee Jee Kee Bhakt Hai. Maan Lakshmee Jee To Prem Aur Karuna Kee Avataar Hain. Ve Apane Bhakton Par Hamesha Mamata Rakhatee Hain. Isalie Too Dhairy Rakh Kar Maan Lakshmee Jee Ka Vrat Kar. Isase Sab Kuchh Theek Ho Jaayega.
‘Maan Lakshmee Jee Ka Vrat’ Karane Kee Baat Sunakar Sheela Ke Chehare Par Chamak Aa Gaee. Usane Poochha: ‘Maan! Lakshmee Jee Ka Vrat Kaise Kiya Jaata Hai, Vah Mujhe Samajhaiye. Main Yah Vrat Avashy Karoongee.’

Maan Jee Ne Kaha: ‘Betee! Maan Lakshmee Jee Ka Vrat Bahut Saral Hai. Use ‘Varada Lakshmi Vrat’ Ya ‘Vaibhav Lakshmi Vrat’ Bhee Kaha Jaata Hai. Yah Vrat Karane Vaale Kee Sab Manokaamana Poorn Hotee Hai. Vah Sukh-Sampatti Aur Yash Praapt Karata Hai. Aisa Kahakar Maan Jee ‘Vaibhav Lakshmi Vrat’ Kee Vidhi Kahane Lagee.

‘Betee! Vaibhav Lakshmi Vrat Vaise To Seedha-Saada Vrat Hai. Kintu Kai Log Yah Vrat Galat Tareeke Se Karate Hain, Atah Usaka Phal Nahin Milata. Kaee Log Kahate Hain Ki Sone Ke Gahane Kee Haladee-Kumakum Se Pooja Karo Bas Vrat Ho Gaya. Par Aisa Nahin Hai. Koee Bhee Vrat Shaastreey Vidhi Se Karana Chaahie. Tabhee Usaka Phal Milata Hai. Sachchee Baat Yah Hai Ki Sone Ke Gahanon Ka Vidhi Se Poojan Karana Chaahie. Vrat Kee Udyaapan Vidhi Bhee Shaastreey Vidhi Se Karana Chaahie.

Yah Vrat Shukravaar Ko Karana Chaahie. Praatahkaal Snaan Karake Svachchh Kapade Pahano Aur Saara Din ‘Jay Maa Lakshmee’ Ka Ratan Karate Raho. Kisee Kee Chugalee Nahin Karanee Chaahie. Shaam Ko Poorv Disha Mein Munh Karake Aasan Par Baith Jao. Saamane Paata Rakhakar Us Par Rumaal Rakho. Rumaal Par Chaaval Ka Chhota Sa Dher Karo. Us Dher Par Paanee Se Bhara Taambe Ka Kalash Rakh Kar, Kalash Par Ek Katoree Rakho. Us Katoree Mein Ek Sone Ka Gahana Rakho. Sone Ka Na Ho To Chaandee Ka Bhee Chalega. Chaandee Ka Na Ho To Nakad Rupaya Bhee Chalega. Baad Mein Ghee Ka Deepak Jala Kar Agarabattee Sulaga Kar Rakho.

Maa Lakshmi Ji Ke Bahut Swaroop Hain. Aur Maan Lakshmi Jee Ko ‘Shriyantra’ Ati Priy Hai. Atah ‘Vaibhav Lakshmi’ Mein Poojan Vidhi Karate Vakt Sarvapratham ‘Shreeyantr’ Aur Lakshmee Jee Ke Vividh Svaroopon Ka Sachche Dil Se Darshan Karo. Usake Baad ‘Lakshmee Stavan’ Ka Paath Karo. Baad Mein Katoree Mein Rakhe Hue Gahane Ya Rupaye Ko Haldee-Kumakum Aur Chaaval Chadhaakar Pooja Karo Aur Laal Rang Ka Phool Chadhao. Shaam Ko Koee Meethee Cheej Bana Kar Usaka Prasaad Rakho. Na Ho Sake To Shakkar Ya Gud Bhee Chal Sakata Hai. Phir Aarti Karke Gyaarah Baar Sachche Hrday Se ‘Jay Maa Lakxmi’ Bolo. Baad Mein Gyaarah Ya Ikkees Shukravaar Yah Vrat Karane Ka Drdh Sankalp Maan Ke Saamane Karo Aur Aapakee Jo Manokaamana Ho Vah Pooree Karane Ko Maan Lakshmee Jee Se Vinatee Karo. Phir Maan Ka Prasaad Baant Do. Aur Thoda Prasaad Apane Lie Rakh Lo. Agar Aap Mein Shakti Ho To Saara Din Upavaas Rakho Aur Sirph Prasaad Kha Kar Shukravaar Ka Vrat Karo. Na Shakti Ho To Ek Baar Shaam Ko Prasaad Grahan Karate Samay Khaana Kha Lo. Agar Thodee Shakti Bhee Na Ho To Do Baar Bhojan Kar Sakate Hain. Baad Mein Katoree Mein Rakha Gahana Ya Rupaya Le Lo. Kalash Ka Paanee Tulasee Kee Kyaaree Mein Daal Do Aur Chaaval Pakshiyon Ko Daal Do. Isee Tarah Shaastreey Vidhi Se Vrat Karane Se Usaka Phal Avashy Milata Hai. Is Vrat Ke Prabhaav Se Sab Prakaar Kee Vipatti Door Ho Kar Aadamee Maalaamaal Ho Jaata Hain Santaan Na Ho To Santaan Praapti Hotee Hai. Saubhaagvatee Stree Ka Saubhaagy Akhand Rahata Hai. Kumaaree Ladakee Ko Manabhaavan Pati Milata Hai.

Sheela Ye Sunkar Aanandit Ho Gai. Phir Poochha: 'Maa! Aapane Vaibhav Lakshmi Vrat Kee Jo Shaastreey Vidhi Bataee Hai, Vaise Main Avashy Karoongee. Kintu Uske Udyaapan Vidhi Kis Tarah Karanee Chaahie? Yah Bhee Krpa Karake Sunaiye.'

Maan Jee Ne Kaha: ‘Gyaarah Ya Ikkis Jo Mannat Maanee Ho Utane Shukravaar Yah Vaibhav Lakshmi Vrat Pooree Shraddha Aur Bhaavana Se Karana Chaahie. Vrat Ke Aakhiree Shukravaar Ko Kheer Ka Naivedy Rakho. Poojan Vidhi Har Shukravaar Ko Karate Hain Vaise Hee Karanee Chaahie. Poojan Vidhi Ke Baad Shreephal Phodo Aur Kam Se Kam Saat Kunvaaree Ya Saubhaagyashaalee Striyon Ko Kumakum Ka Tilak Karake ‘Vaibhav Lakshmi Vrat’ Kee Ek-Ek Pustak Upahaar Mein Denee Chaahie Aur Sab Ko Kheer Ka Prasaad Dena Chaahie. Phir Dhanalakshmee Svaroop, Vaibhav Lakshmi Swaroop, Maan Lakshmee Jee Kee Chhavi Ko Pranaam Karen. Maan Lakshmee Jee Ka Yah Svaroop Vaibhav Dene Vaala Hai. Pranaam Karake Man Hee Man Bhaavukata Se Maan Kee Praarthana Karate Vakt Kahen Ki , ‘He Maan Dhanalakshmee! He Maa Vaibhav lakshmi! Mainne Sachche Hrday Se Aapaka Vrat Poorn Kiya Hai. To He Maan! Hamaaree Manokaamana Poorn Keejie. Hamaara Sabaka Kalyaan Keejie. Jise Santaan Na Ho Use Santaan Dena. Saubhaagyashaalee Stree Ka Saubhaagy Akhand Rakhana. Kunvaaree Ladakee Ko Manabhaavan Pati Dena. Aapaka Yah Chamatkaaree Vaibhava Lakshmi Vrat Jo Kare Usakee Sab Vipatti Door Karana. Sab Ko Sukhee Karana. He Maan! Aapakee Mahima Aparampaar Hai.’

Maan Jee Ke Paas Se Vaibhav Lakshmi Vrat Kee Shaastreey Vidhi Sunakar Sheela Bhaavavibhor Ho Uthee. Use Laga Maano Sukh Ka Raasta Mil Gaya. Usane Aankhen Band Karake Man Hee Man Usee Kshan Sankalp Liya Ki, ‘He Vaibhav Lakshmi Maa! Main Bhee Maan Jee Ke Kahe Anusaar Shraddhaapoorvak Shaastreey Vidhi Se Vaibhav Lakshmi Vrat Ikkees Shukravaar Tak Karoongee Aur Vrat Kee Shaastreey Reeti Ke Anusaar Udyaapan Bhee Karoongee.

Sheela Ne Sankalp Karake Aankhen Kholee To Saamane Koee Na Tha. Vah Vismit Ho Gaee Ki Maan Jee Kahaan Gayee? Yah Maan Jee Koee Doosara Nahin Saakshaat Lakshmee Jee Hee Theen. Sheela Lakshmee Jee Kee Bhakt Thee Isalie Apane Bhakt Ko Raasta Dikhaane Ke Lie Maan Lakshmee Devee Maan Jee Ka Svaroop Dhaaran Karake Sheela Ke Paas Aaee Theen.

Doosare Din Shukravaar Tha. Praatahkaal Snaan Karake Svachchh Kapade Pahan Kar Sheela Man Hee Man Shraddha Aur Poore Bhaav Se ‘Jay Maan Lakshmee’ Ka Man Hee Man Ratan Karane Lagee. Saara Din Kisee Kee Chugalee Nahin Kee. Shaam Huee Tab Haath-Paanv-Munh Dho Kar Sheela Poorv Disha Mein Munh Karake Baithee. Ghar Mein Pahale To Sone Ke Bahut Se Gahane The Par Pati Ne Galat Raaste Par Chalakar Sab Giravee Rakh Diye. Par Naak Kee Keel (Pullee) Bach Gaee Thee. Naak Kee Keel Nikaal Kar, Use Dhokar Sheela Ne Katoree Mein Rakh Dee. Saamane Paate Par Rumaal Rakh Kar Muththee Bhar Chaaval Ka Dher Kiya. Us Par Taambe Ka Kalash Paanee Bharakar Rakha. Usake Oopar Keel Vaalee Katoree Rakhee. Phir Vidhipoorvak Vandan, Stavan, Poojan Vagairah Kiya Aur Ghar Mein Thodee Shakkar Thee, Vah Prasaad Mein Rakh Kar Vaibhava Lakshmi Vrat Kiya.

Yah Prasaad Pahale Pati Ko Khilaaya. Prasaad Khaate Hee Pati Ke Svabhaav Mein Phark Pad Gaya. Us Din Usane Sheela Ko Maara Nahin, Sataaya Bhee Nahin. Sheela Ko Bahut Aanand Hua. Usake Man Mein Vaibhav Lakshmee Vrat Ke Lie Shraddh Badh Gaee.
Sheela Ne Poorn Shraddha-Bhakti Se Ikkees Shukravaar Tak Vrat Kiya. Ikkeesaven Shukravaar Ko Vidhipoorvak Udyaapan Vidhi Karake Saat Striyon Ko Vaibhava Lakshmee Vrat Kee Saat Pustaken Upahaar Mein Deen. Phir Maata Jee Ke ‘Dhanalakshmee Svaroop’ Kee Chhavi Ko Vandan Karake Bhaav Se Man Hee Man Praarthana Karane Lagee: ‘He Maan Dhanalakshmee! Mainne Aapaka Vaibhav lakshmi Vrat Karane Kee Mannat Maanee Thee Vah Vrat Aaj Poorn Kiya Hai. He Maan! Meree Har Vipatti Door Karo. Hamaara Sabaka Kalyaan Karo. Jise Santaan Na Ho, Use Santaan Dena. Saubhaagyavatee Stree Ka Saubhaagy Akhand Rakhana. Kunvaaree Ladakee Ko Manabhaavan Pati Dena. Jo Koee Aapaka Yah Chamatkaaree Vaibhav lakshmi Vrat Kare, Usakee Sab Vipatti Door Karana. Sab Ko Sukhee Karana. He Maan! Aapakee Mahima Apaar Hai.’ Aisa Bolakar Lakshmeejee Ke Dhanalakshmee Svaroop Kee Chhavi Ko Pranaam Kiya.

Is Tarah Shaastreey Vidhi Se Sheela Ne Shraddha Se Vrat Kiya Aur Turant Hee Use Phal Mila. Usaka Pati Sahee Raaste Par Chalane Laga Aur Achchha Aadamee Ban Gaya Tatha Kadee Mehanat Se Vyavasaay Karane Laga. Dheere Dheere Samay Parivartit Hua Aur Usane Sheela Ke Giravee Rakhe Gahane Chhuda Lie. Ghar Mein Dhan Kee Baadh See Aa Gaee. Ghar Mein Pahale Jaisee Sukh-Shaanti Chha Gaee.

Vaibhav Lakshmi Vrat Ka Prabhaav Dekhakar Mohalle Kee Doosaree Striyaan Bhee Shaastreey Vidhi Se Vaibhav Lakshi Ka Vrat Karane Lageen. He Maan Dhanalakshmee! Aap Jaise Sheela Par Prasann Hueen, Usee Tarah Aapaka Vrat Karane Vaale Sab Par Prasann Hona. Sabako Sukh-Shaanti Dena. Jay Dhanalakshmee Maan! Jay Vaibhav Lakshmi Maan!

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